Friday, 5 June 2020

धीर समीरे यमुना तीरे

                       

                                

यमुनोत्री ग्लेशियर से निकलने वाली सूर्यपुत्री एवं यम की बहन पावन सलिला यमुना जिसकी परंपरा में प्रेरणा, जीवन और दिव्य भाव समाहित हैं।  यशोदानंदन कन्हैया की बाललीलाओं से लेकर षोडश कला में निपुण अवतारी पुरुष तक कितने ही प्रसंग यमुना और कालिंदी से जुड़े हैं। 

3 राज्यों से गुज़रने वाली यमुना कोटि-कोटि मानवों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली रही है... किन्तु भौतिकता और आधुनिकता की चकाचौंध में सब भूलकर हमने इस पवित्र नदी को प्रदूषित करने मेंकोई कसर नहीं छोड़ी..  घरों से निकलने वाला वेस्ट या सीवेज उद्योगों से निकलने वाले केमिकल और टॉक्सिक आदि ने यमुना के आचमन वाले शुद्ध जल  की गुणवत्ता को ही एक दृष्टांत बना दिया इससे नदी का इकोसिस्टम पूरी तरह से बिगड़ गया.. यमुना नदी में अगर कुछ दिखाई देता था तो बस काला पानी और और उसके ऊपर सफेद झाग। लेकिन जब समय बदला और कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के दौरान यमुना नदी न केवल अपने मूल रूप में प्रवाहित होती दिख रही है  बल्कि इससे विलुप्त हुए  कई दुर्लभ देशी-विदेशी पक्षी भी दिखने लगे हैं..   लगभग 1400 किमी लंबी यमुना नदी के साफ पानी में इन दिनों मछलियां अठखेलियाँ करती  दिख रही हैं..  हीरोन, इबिस पेंटेड स्टार्क जैसे तमाम देसी विदेशी पक्षी अब दशकों बाद  पुनः यमुना नदी के आसपास दिखने लगे हैं। 

वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया-देहरादून के संरक्षण अधिकारी डॉ राजीव चौहान पिछले 30 साल से यमुना नदी को स्टडी कर रहे हैं.. उनके अनुसार -

"मैं वर्ष 2000 से यमुना एक्शन प्लान से जुड़ा हुआ हूं और मैंने इस नदी को कभी साफ नहीं देखा है.मैं नदियों पर लॉकडाउन का प्रभाव देखकर हैरान हूं। 

इसके अलावा, Delhi Pollution Control Committee की खोज के अनुसारदिल्ली में लॉकडाउन से पहले और बाद के आंकड़ों में तुलना की गयी, जिसके बाद यमुना के 33 प्रतिशत ज्यादा साफ़ होने की बात सामने आई. साथ ही मथुरा के पास इसके पानी की गुणवत्ता सुधरने की बात कही गयी। 

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (डीपीसीसी) के अनुसार लॉकडाउन के दौरान ताज़े पानी की उपलब्धता में वृद्धि और औद्योगिक कचरा नहीं होने के कारण यमुना के पानी की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है... दिल्ली के आवासीय क्षेत्रों में स्थित 28 औद्योगिक क्लस्टर और उद्योगों से औद्योगिक कचरा भी लॉकडाउन के दौरान बंद रहा... आवासीय क्षेत्रों में 51,000 से अधिक उद्योग हैं। लॉकडाउन के दौरान पूजा सामग्री, ठोस कचरा नहीं डाले जाने, नहाने और कपड़े नहीं धोने के वजह से पानी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। 



प्रकृति के अंदर इतनी शक्ति है कि वह जब चाहे स्वयं को स्वतः ठीक कर मौलिक रूप धारण कर लेती है ,इसे बिगाड़ने वाला तो मनुष्य ही है .. है..यही वह यमुना है जिसका माहात्म्य ऋग्वेद से लेकर श्रीमद्भागवत और पद्म पुराण जैसे हमारे सम्पूर्ण वांग्मय में वर्णित है..मानव जीवन लेकर सब कुछ पाने के बाद भी यदि यमुना में स्नान का अवसर प्राप्त नहीं किया तो सब निरर्थक है- " मनुष्यानाम हतम जन्म कालिंदी मज्जनं बिना, भस्मी भवन्ति सर्वाणि यमुना मज्जनानृप" शायद   यही कारण  है कि यमुना नदी जिस पर हजारों करोड़ रुपये सरकार द्वारा खर्च किये गये..फिर भी उसकी हालत गंदे नाले के सामान बनी रही लेकिन ..लॉकडाउन के चलते 2 महीने में ही यमुना का पानी स्वच्छ हो गया है... यह सब को दिख गया है कि नदियाँ  किसी प्राकृतिक आपदा के कारण  नहीं  बल्कि मनुष्य के स्वार्थ और संवेदनहीनता के कारण बदहाल  है..   यह संकट आधुनिक सभ्यता का संकट है और संस्कृतिविहीन समाज का भी....सरकार के साथ-साथ देश के आम नागरिकों को भी यमुना को स्वच्छ व निर्मल बनाए रखने कासंकल्प लेना चाहिए ,यह सबका राष्ट्रीय कर्तव्य है।